चलेगी जब तेरी यादों की पुरवाई तो क्या होगा पुरानी चोट कोई फिर उभर आई तो क्या होगा, मुहब्बत ख़ुद ही बन बैठी तमाशाई तो क्या होगा न हम होंगे, न तुम होंगे, न तनहाई तो क्या होगा, मुहब्बत की झुलसती धूप और काँटों भरे रस्ते तुम्हारी याद नंगे पाँव गर आई तो क्या होगा, ऐ मेरे दिल तू उनके पास जाता है तो जा, लेकिन तबीअत उनसे मिलकर और घबराई तो क्या होगा,